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राजस्थान में जैन धर्म
मेवाड देश जिनशासन का अभिन्न अंग रहा है। इतिहास इसका साक्षी है। अजमेर जिले के बडलीनगर से इतिहासविद् श्रीमान् गौरीशंकर हीराचंद ओझा को शिलालेख प्राप्त हुआ था, जो वर्तमान में यह लेख अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित है। उस लेख के अनुसार…
“वीराय भगवते चातुरासिति वासे माझिमिके”
भावार्थ…
“वीर निर्वाण के ८४ साल बाद मध्यमिका नगरे”, यह शिलालेख विश्व का सबसे प्राचीन शिलालेख माना जाता है। इससे यह भी सिद्ध होता है की वीर संवत् विश्व का सबसे प्राचीन संवत् है। वीर निर्वाण के ८४ साल बाद मेवाड के कई नगरों में जिनप्रतिमाजी की प्रतिष्ठा ओसवाल वंशोद्वारक आ. श्री रत्नप्रभसूरिजी म. के हाथों हुई थी। स्वयं भगवान पार्श्वनाथ एवं भगवान महावीर का भी विचरण इस क्षेत्र में हुआ है।
१४४४ ग्रंथों के रचयिता पू.आ. हरिभद्रसूरिजी का आचार्यपद व निर्वाण इसी मेवाड की धरती चितौडगढ में हुआ था। तपागच्छादिराज जगत्चन्द्रसूरिजी महाराज का जन्म (आयड), दीक्षा (आयड) व निर्वाण (वीरशालीग्राम) भी इसी मेवाड की भूमि पर हुआ था। इसी प्रकार तपागच्छ के परमप्रभावक आ. विद्यामंडनसूरिजी म.सा. एवं शत्रुंजय तीर्थोद्धारक तपागच्छीय श्रावक कर्माशा का भी जन्म आदि मेवाड में हुआ था।
इसके अतिरिक्त मेवाड के धन्नाशा पोरवाल द्वारा राणकपुर जैसा महातीर्थ बनाकर तपागच्छीय आ. सोम सुंदरसूरिजी म.सा. के द्वारा प्रतिष्ठा करवाई गई थी। जो आज मेवाड की शान बढ़ा रहा है।
उसी प्रकार मेवाड के दयालशा ने दयालशा किल्ले पर विशालकाय जिनमंदिर बनवाया । मेवाड के प्राचीन ऐसे तीर्थ देलवाडा (जहाँ ३-३ बावन जिनालय है), बनेरा (विश्व का सबसे विशाल मंदिर), जहाजपुर, चंवलेश्वर, करेडाजी, चितौडगढ, राजपुरा (कानोड). गोगुंदा, इसवाल आदि अनेक तीर्थ मेवाड में मूर्तिपूजक परंपरा के इतिहास के साक्षी है।
इसी श्रेणी में जन-जन की आस्था एवं श्रद्धा का केन्द्र श्री केसरियाजी महातीर्थ भी मेवाड में बिराजमान है जहाँ आरती की रचना हुई थी।
- मसुदा नगर से महाराणा प्रताप ने तपागच्छाचार्य जगद्गुरु श्री हीरविजयसूरिजी म.सा. को मेवाड पधारने व लोगो को धर्मोपदेश देने की विनंती की थी उसके पश्चात् आचार्यश्री मेवाड पधारे थे ।
- विश्व में जिनकी कीर्ति प्रसिद्ध है ऐसे परम दानवीर भामाशाह भी इसी मेवाड की धरती पर हुए एवं महाराणा प्रताप ने इसी मेवाड की रक्षा की।
- तपागच्छाचार्य श्री पूज्य देवेन्द्रसूरिजी, जिनेन्द्रसूरिजी, धरणेन्द्रसूरिजी, दयासूरिजी, क्षमासूरिजी आदि का भी मेवाड पर वर्चस्व रहा तथा आपश्रीने मेवाड में कई प्रतिष्ठाएँ करवाई। मेवाड में गाँव-गाँव, नगर-नगर में तपागच्छीय श्रीपूज्यो की गादी थी।
- आज विचरण के अभाव से मेवाड में जैनत्व की जाहोजलाली पर असर पड़ा है, आलंबन की भी यहाँ कमी है। लोगो को आलंबन प्राप्त हो व मेवाड का लोगो के समक्ष इतिहास प्रस्तुत हो इसी भावना से श्री “केसरियाजी धाम महातीर्थ” की स्थापना हो रही है।
- पूर्व में संपूर्ण मेवाड में केसरियानाथ की आस्था थी। लोग एक-दूसरे को ‘जय केसरियानाथजी’ करके संबोधन करते थे। गाँव-गाँव में केसरियानाथ के मंदिर थे, लेकिन मूल केसरियाजी में लडाई-हागडे के चलते लोगो की आस्था-श्रद्धा कम होने लगी। अब पुनः लोगो को अपने आराध्य देव से जुड़े यही हमारी भावना है।
- कई जगह विरान पडे जिनमंदिरों से प्राचीन प्रतिमाएँ आदि इसी तीर्थ पर बिराजमान हो रही है। जहाँ अपनी बस्ती नहीं है, वहाँ से कुछ मंदिरो को संपूर्ण मंगल करके प्रतिमाजी को इस तीर्थ पर बिराजमान कीया जा रहा है। करीब १३१ प्राचीन प्रतिमाजी इस तीर्थ पर लाये जा चुके है।
तपागच्छाधिराज दादागुरुदेव
श्री जगच्चन्द्रसूरिजी और मेवाड
श्रमण भगवान महावीर की ४४ वीं पाट पर महातपस्वी, शासनशिरोमणी, जंगमयुगप्रधान, मेवाड-मालवा देशोद्धारक आ. श्री जगच्चन्द्रसूरिजी महाराजा हुए।
दादागुरुदेव का यावज्जीव आयंबिल का पच्चक्रवाण था। इस व्रत को देखकर मेवाड के महाराजा जैत्रसिंह द्वारा आघाटपुर (आयड) में उनको तपा-हीरला बिरुद अर्पण कीया गया । आचार्यश्री को इस बिरुद मिलने से श्रमण भगवान महावीर की पाटपरंपरा जो पूर्व में निम्नोक्त नामो से प्रसिद्ध थी वो अब ‘तपागच्छ’ नाम से प्रसिद्ध हुई।
श्रमण भगवान महावीर की परंपरा व उनके नामांतर :
निग्रंथगच्छ – आ. आर्यसुधर्मास्वामी से
कोटीगच्छ – आ. सुहस्तिसूरिजी म. के शिष्यो द्वारा कोटी जाप से
चन्द्रगच्छ – आ. चन्द्रसूरिजी से
वनवासीगच्छ – आ. समन्तभद्रसूरिजी के वनवास से
वडगच्छ – आ. उद्योतनसूरिजी द्वारा बड वृक्ष निचे अपने शिष्यो को आचार्यपद देने से
तपागच्छ – आ. जगत्त्चन्द्रसूरिजी को ‘तपा’ बिरुद प्राप्त होने से ।
याद रहे समय समय पर पूर्व महापुरुषो को मिले पद या उनके जिवन से जुड़ी घटना के कारण श्रमण भगवान महावीर की मूल परंपरा का नामांतर होता गया । इसका मतलब यह नहीं की परंपरा का कोई नया मत लेकर जन्म हुआ यह भगवान महावीर की अक्षुण्ण परंपरा का अंग है।
दादागुरुदेव जगत्चन्द्रसूरिजी महाराजा परमशासनप्रभावक हुए… उनके द्वारा अनेक कल्याणक भूमि सह चितौडगढ, आयड, कुंभलगढ, मांडलगढ, केसरियाजी आदि अनेक तीर्थों का तीर्थाद्धार करवाया गया व संयमनिष्ठ एवं चमत्कारी थे ।
आचार्यश्री की प्रेरणा से महाराजा जैत्रसिंह द्वारा निम्नोक्त आदेश दीए गए। मेवाड में जो भी नया नगर बसाया जाए वहाँ सबसे पहले श्री केसरियाजी दादा का मंदिर बनाया जाए। बाद में नगर बसाया जाए। मेवाड की गदी पर आनेवाला महाराजा सबसे पहले केसरियाजी को आंगी चढाए और तपागच्छीय गच्छाधिपति को गुरुपूजन-कांबली अर्पण करे ।
पू. आचार्यश्री के द्वारा अंजनशलाका-प्रतिष्ठा विधि को भी शुद्ध किया गया था व अनेक ग्रंथों की रचना उनके सान्निध्य में हुई। उन्होने ७.७ वादिओ को वाद में हराया था।
पू. आचार्यश्री के ‘तपा’ बिरुद प्राप्ति का ८०० वाँ वर्ष २०८५ में आएगा। उस निमित्त से ‘तपागच्छ कीर्तिस्तंभ’ बनवाया जा रहा है। जहाँ आपश्री के प्रभावशाली, चमत्कारी प्राचीन प्रतिमाजी एवं चरण की स्थापना होगी ।
विशेष जानने हेतु श्रीयुत् भूषणभाई शाह लीखीत ‘जंगमयुगप्रधान चगच्चन्द्रसूरि पुस्तक पढ़ें

श्री केसरिया धाम श्वेतांबर मूर्तिपूजक तपागच्छ जैन ट्रस्ट
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