हमारे बारे में
हमारे ट्रस्ट की कर्मभूमि – अजमेर पट्टी
ट्रस्ट द्वारा विगत 10/12 वर्षों से इस क्षेत्र में कई मंदिरो के जीर्णोद्धार करवाए गए है… अतः विजयनगर-गुलाबपुर अब संस्था की कर्मभूमि सी बन गई है।
समय-समय पर आस-पास के मंदिरो का शुद्धिकरण अभियान, जैनत्व जागरण अभियान, उपकरणपूर्ती, जिनमंदिर निभाव हेतु राशी अर्पण, श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्रमण-श्रमणी वृंद का विचरण, ओपन बुक एक्झाम इत्यादि प्रवृत्तियाँ चलती रहती है।
विगत वर्षों में अपने साधर्मिक परिवारो को बसाकर इस क्षेत्र में लोगो को जिनशासन से जोडने का कार्य ट्रस्ट द्वारा हो रहा है। अनेक साधर्मिक परिवारो की भक्ति, अनुकंपा, पांजरापोल में सहयोग आदि भी दीया जाता है।
तपागच्छादिराज दादा गुरु जगतचंद्रसूरिजी और मेवाड
श्रमण भगवान महावीर की ४४ वीं पाट पर महातपस्वी, शासनशिरोमणी, जंगमयुगप्रधान, मेवाड-मालवा देशोद्धारक आ. श्री जगत्चन्द्रसूरिजी महाराजा हुए।
दादागुरुदेव का यावज्जीव आयंबिल का पच्चक्खाण था। इस व्रत को देखकर मेवाड के महाराजा जैत्रसिंह द्वारा आघाटपुर (आयड) में उनको “तपा-हिरता बिरुद अर्पण कीया गया। आचार्यश्री को इस विरुद मिलने से श्रमण भगवान महावीर की पाटपरंपरा जो पूर्व में निम्नोक्त नामो से प्रसिद्ध थी वो अब ‘तपागच्छ’ नाम से प्रसिद्ध हुई ।
श्रमण भगवान महावीर की परंपरा उनके नामांतर :
निर्ग्रन्थ गच्छ – आ. आर्यसुधर्मास्वामी से
कोटी गच्छ – आ. सुहस्तिसूरिजी म. के शिष्यो द्वारा कोटी जाप से
चन्द्र गच्छ – आ. चन्द्रसूरिजी से
वनवासी गच्छ – आ. समन्तभद्रसूरिजी के वनवास से
वड गच्छ – आ. उद्योतनसूरिजी द्वारा बड वृक्ष निचे अपने शिष्यो को आचार्यपद देने से
तपा गच्छ – आ. जगत्चन्द्रसूरिजी को ‘तपा’ बिरुद प्राप्त होने से ।
याद रहे समय समय पर पूर्व महापुरुषो को मिले पद या उनके जिवन से जुडी घटना के कारण श्रमण भगवान महावीर की मूल परंपरा का नामांतर होता गया। इसका मतलब यह नहीं की परंपरा का कोई नया मत लेकर जन्म हुआ यह भगवान महावीर की अक्षुण्ण परंपरा का अंग है।
दादागुरुदेव जगत्चन्द्रसूरिजी महाराजा परमशासनप्रभावक हुए… उनके द्वारा अनेक कल्याणक भूमि सह चितौडगढ, आयड, कुंभलगढ, मांडलगढ, केसरियाजी आदि अनेक तीर्थों का तीर्थाद्धार करवाया गया व संयमनिष्ठ एवं चमत्कारी थे।
आचार्यश्री की प्रेरणा से महाराजा जैत्रसिंह द्वारा निम्नोक्त आदेश दीए गए। मेवाड में जो भी नया नगर बसाया जाए वहाँ सबसे पहले श्री केसरियाजी दादा का मंदिर बनाया जाए । बाद में नगर बसाया जाए। इसी लीए मेवाड के गांव गांव में केसरियानाथ के मंदिर है।
मेवाड की गदी पर आनेवाला महाराजा सवसे पहले केसरियाजी को आंगी चढाए और तपागच्छीय गच्छाधिपति को गुरुपूजन-कांवली अर्पण करे ।
पू. आचार्यश्री के द्वारा अंजनशलाका-प्रतिष्ठा विधि को भी शुद्ध किया गया था व अनेक ग्रंथों की रचना उनके सान्निध्य में हुई। उन्होने 7.7 वादिओ को वाद में हराया था ।
पू. आचार्यश्री के ‘तपा’ बिरुद प्राप्ति का ८०० वाँ वर्ष २०८२ में आएगा। उस निमित्त से ‘तपागच्छ कीर्तिस्तंभ’ बनवाया जा रहा है । जहाँ आपश्री के प्रभावशाली प्राचीन प्रतिमाजी एवं चरण की स्थापना होगी ।
हमारा दृष्टिकोण
हमारा लक्ष्य श्री केसरियाजी धाम महातीर्थ जैसे अनोखे तीर्थस्थलों का निर्माण करके मेवाड़ क्षेत्र को एक जैन धर्म का प्रमुख केंद्र बनाना है, जहाँ यात्री प्राचीन तीर्थों की यात्रा कर सकें और हमारी धार्मिक धरोहरों का संरक्षण हो सके।
हम चाहते हैं कि प्रत्येक गाँव और शहर में जैन धर्म की शिक्षाओं का पुनरुत्थान हो, ताकि यह क्षेत्र फिर से जैन धर्म की शिक्षा और संस्कारों से समृद्ध हो।
हमारा उद्देश्य
हमारा मिशन जैन धर्म की धरोहरों और जिनमंदिरों का संरक्षण और पुनर्निर्माण करना है। हम समाज में जिनशासन का प्रचार-प्रसार करते हुए, प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार, धार्मिक जागरण, और जैनत्व के मूल्यों की पुनःस्थापना में योगदान कर रहे हैं।
हमारा उद्देश्य स्थानीय समुदायों को धार्मिक गतिविधियों से जोड़ना, उन्हें सहारा प्रदान करना, और जैन धर्म की अमूल्य परंपराओं को नई पीढ़ियों तक पहुंचाना है।
मेवाड देश में जैन धर्म
मेवाड देश जिनशासन का अभिन्न अंग रहा है। इतिहास इसका साक्षी है। अजमेर जिले के वडलीनगर से इतिहासविद् श्रीमान् गौरीशंकर हीराचंद ओझा को शिलालेख प्राप्त हुआ था, जो वर्तमान में यह लेख अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित है। उस लेख के अनुसार.
“वीराय भगवते चातुरासिति वासे माझिमिकें”
भावार्थ…
वीर निर्वाण के ८४ साल बाद मध्यमिका नगरे, यह शिलालेख विश्व का सबसे प्राचीन शिलालेख माना जाता है। इससे यह भी सिद्ध होता है की वीर संवत् विश्व का सबसे प्राचीन संवत् है। वीर निर्वाण के ८४ साल बाद मेवाड के कई नगरों में जिनप्रतिमाजी की प्रतिष्ठा आ. श्री रत्नप्रभसूरिजी म. के हाथों हुई थी। स्वयं भगवान पार्श्वनाथ एवं भगवान महावीर का भी विचरण इस क्षेत्र में हुआ है।
ओसवाल १४४४ ग्रंथों के रचयिता पू.आ. हरिभद्रसूरिजी का आचार्यपद व निर्वाण इसी मेवाड की धरती चितौडगढ में हुआ था । तपागच्छाधिराज जगत्चन्द्रसूरिजी महाराज का जन्म (आयड), दीक्षा (आयड) आचार्यपद (चितौडगढ़) व निर्वाण (वीरशालीग्राम) भी इसी मेवाड की भूमि पर हुआ था।
इसी प्रकार तपागच्छ के परमप्रभावक आ. विद्यामंडनसूरिजी म.सा. एवं शत्रुंजय तीर्थोद्धारक तपागच्छीय श्रावक कर्माशा का भी जन्म आदि मेवाड में हुआ था । इसके अतिरिक्त मेवाड के धन्नाशा पोरवाल द्वारा राणकपुर जैसा महातीर्थ बनाकर तपागच्छीय आ. सोमसुंदरसूरिजी म.सा. के द्वारा प्रतिष्ठा करवाई गई थी। जो आज मेवाड की शान वढा रहा है।
उसी प्रकार मेवाड के दयालशा ने दयालशा किल्ले पर विशालकाय जिनमंदिर बनवाया ।
मेवाड के प्राचीन ऐसे तीर्थ देलवाडा (जहाँ ३-३ बावन जिनालय है), बसेरा (विश्व का सबसे विशाल मंदिर), जहाजपुरा, चंवलेश्वर, क्रेडाजी, चितौडगढ, राजपुरा (कानोड), गोगुंदा, इसवाल आदि अनेक तीर्थ मेवाड में मूर्तिपूजक परंपरा के इतिहास के साक्षी है।
इसी श्रेणी में जन-जन की आस्था एवं श्रद्धा का केन्द्र श्री केसरियाजी महातीर्थ भी मेवाड में बिराजमान है जहाँ आरती की रचना हुई थी।
मसुदा नगर से महाराणा प्रताप ने तपागच्छाचार्य जगद्गुरु श्री हीरविजयसूरिजी म.सा. को मेवाड पधारने व लोगो को धर्मोपदेश देने की विनंती की थी उसके पश्चात् आचार्यश्री मेवाड पधारे थे ।
विश्व में जिनकी कीर्ति प्रसिद्ध है ऐसे परम दानवीर भामाशाह भी इसी मेवाड की धरती पर हुए एवं महाराणा प्रताप ने इसी मेवाड की रक्षा की।
तपागच्छाचार्य श्री पूज्य देवेन्द्रसूरिजी, जिनेन्द्रसूरिजी, धरणेन्द्रसूरिजी, दयासूरिजी, क्षमासूरिजी आदि का भी मेवाड पर वर्चस्व रहा तथा आपश्रीने मेवाड में कई प्रतिष्ठाएँ करवाई। मेवाड में गाँव-गाँव, नगर-नगर में तपागच्छीय श्रीपूज्यो की गादी थी ।
केसरिया धाम में आपका स्वागत है, जहाँ आप शांति और आस्था का अनुभव कर सकते हैं। यहाँ जैन धर्म से जुड़े धार्मिक और सामाजिक कार्य होते हैं।
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